मैं तुझपर रोज मारता हूं… – साकेत

तुम्हे एक बात बताऊं
मैं तुम्हे याद करता हूं…
जमाना कहता है ये बेशर्म अब भी जिंदा है
जबकि मैं तो तुझपर रोज मारता हूं…

जमाने में गलतफहमी है
तेरे मेरे एक होने की…
मेरी बदनामी शहर भर में फैली तूफानों सी
और तुम्हारी नेक होने की…

तुम्हारे मेज़ पर रखी
एक तस्वीर क्या मैं उठा लाया…
किसी ने कस्बों के कान भर दिए कि
मैं तुझे ही भगा लाया…

क्या होता सोचता हूं
तू अगर जो साथ मेरे चली आती…
तू जान मेरी मेरे साथ आती
और मेरी जान चली जाती…

सोचता हूं कूद पड़ूं छत से
और जा गीरूं सीधे तेरे दिल में…
मगर फिसल जाते है पांव अक्सर और
गिर पड़ता हूं मुश्किल में…

लोग इतने कमीने हैं
की दिल तोड़ देते हैं…
आशिक अगर पकड़ा जाए गली में
तो सिर फोड़ देते हैं…

अब क्या ही बताऊं मैं तुम्हे
मेरा ठिकाना तुमसे क्यों इतना दूर है…
बचाना है मुझे मेरा सिर इन सिरफिरों से
क्योंकि ये आधा तो पहले से ही चूर है…

जब नाम है ही नहीं
बदनाम खुदको करवाना ही क्यों है…
पीछे का फटा क्या काफी नहीं है सिर पर
आगे से अब फड़वाना ही क्यों है…

तू न समझेगी प्रिय
जालिम है कितना ये ज़माना…
एक काम करना अगले जन्म में
मैं बनूंगा तुमसा तुम मेरी जगह पर आना…

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